रामकृष्ण परमहंस के 41 उपदेश Ramkrishna Paramhans quotes in hindi

श्री रामकृष्ण परमहंस भारत के महानतम संतों में गिने जाते हैं। वे स्वामी विवेकानंद जी के गुरु थे। रामकृष्ण परमहंस के Quotes समझने में सरल परंतु गहरे और ज्ञानपूर्ण हैं। उनके उपदेश भगवान का सच्चा ज्ञान कराते हैं और हृदय में ईश्वरीय प्रेम, विश्वास और आध्यात्मिक विचारों को जन्म देते हैं। उन्होंने सरल उदाहरणों के माध्यम से वेद-पुराणों के गूढ रहस्यों का उद्घाटन किया था। Ramkrishna Paramhansa देव एक सच्चे संत और अवतार पुरुष थे। वे माँ काली के अनन्य भक्त थे और उन्हें देवी के साक्षात दर्शन होते थे।

Ramkrishna Paramhansa Quotes in hindi – रामकृष्ण परमहंस अनमोल वचन और उपदेश

1) तुम रात को आसमान में बहुत सारे तारों को देखते हो लेकिन सूर्य निकलने के बाद तारे नहीं दिखते। क्या तुम कहोगे कि दिन में आसमान में तारे होते ही नहीं ? सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम अपने अज्ञान की वजह से भगवान को देख नहीं पाते, ये मत कहो कि भगवान जैसी कोई चीज नहीं होती।

2) जिस प्रकार मिट्टी के खिलौने का हाथी या फल देखना असली हाथी या फल की याद दिलाते हैं, उसी प्रकार ईश्वर के चित्र और मूर्तियाँ भी उस परमात्मा की याद दिलाते हैं जोकि सनातन और सर्वव्यापी है।

3) भगवान के कृपा की हवा तो हमेशा ही बह रही है, ये हमारे हाथ में है कि हम अपनी नाव की पाल चढ़ायें और ईश्वरीय कृपा की दिशा में बढ़ जायें।

4) मनुष्य तकिये के कवर जैसा है। एक कवर का रंग लाल है, दूसरे का नीला और तीसरे का रंग काला है ; लेकिन सबके अंदर वही रुई भरी हुई है। यही मनुष्यों में भी है, एक सुंदर है, दूसरा बदसूरत है, तीसरा साधु है और चौथा दुष्ट है लेकिन ईश्वरीय तत्व सबके अंदर है।

5) भगवान जब जगह है लेकिन हर मनुष्य के रूप में वो तुम्हारे समक्ष ही तो है। प्राणीमात्र को ईश्वर मानते हुए उसकी सेवा करो। यह ईश्वर की पूजा के समान ही फलदायी है।

6) जरूरी चीज है छत तक पहुंचना। तुम पत्थर की सीढ़ी चढ़कर जा सकते हो, बांस की सीढ़ी से चढ़कर जा सकते हो या रस्सी से भी चढ़कर जा सकते हो। तुम सिर्फ एक बांस की मदद से भी चढ़कर ऊपर पहुँच सकते हो। इसी तरह भगवान को भी किसी भी मार्ग से प्राप्त किया जा सकता है। सभी धर्म के मार्ग सत्य हैं।

7) तुम ईश्वर की चाहे जैसे प्रार्थना करो, वो उन तक पहुँचती है। ध्यान रखो वो चींटी के कदमों की आहट भी सुन सकते हैं।

8) ईश्वर के अनंत नाम हैं और असंख्य रास्ते हैं जिससे उनसे संपर्क किया जा सकता है। तुम जिस भी नाम और रूप से उनकी वंदना करोगे, उसी से वो तुमको प्राप्त हो जायेंगे।

9) सूर्य का प्रकाश हर जगह एक समान ही पड़ता है लेकिन सिर्फ चमकदार सतह जैसे पानी की सतह या दर्पण ही उसे परावर्तित करता है। ईश्वर का दिव्य प्रकाश भी ऐसा ही है। ये सबके हृदय पर बराबर, बिना पक्षपात के पड़ता है परंतु केवल पवित्र और सच्चे हृदय वाले लोग ही उस दिव्य प्रकाश को सही से ग्रहण और परावर्तित कर पाते हैं।

10) भगवान तो सबके मन में हैं लेकिन सबका मन भगवान में नहीं लगा है, इसीलिए हम कष्ट और दुर्गति भोगते हैं।

11) बरसात का पानी ऊंची जमीन पर नहीं टिकता, वो बहकर नीचे ही आता है। जो विनम्र और सच्चे हैं उनपर ईश्वर की दया बनी रहती है परंतु अहंकारी और दंभी पर अधिक देर तक टिक नहीं पाती।

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12) जैसे तुम ईश्वर से भक्ति के लिए प्रार्थना करते हो, वैसे ही उनसे प्रार्थना करो कि तुम्हारे अंदर से दूसरों का दोष देखना बंद हो जाए।

13) एक अनंत जल स्रोत की कल्पना करो ; ऊपर और नीचे, आगे और पीछे, दायें और बायें, हर जगह पानी है। इस पानी में पानी से भरा हुआ एक बर्तन रख दो। बर्तन के अंदर पानी है और बाहर भी पानी है। ज्ञानी पुरुष देखता है कि बाहर और भीतर दोनों जगह सिवाय परमात्मा के कुछ और नहीं है। तो फिर ये बर्तन क्या है ? ये बर्तन ही ‘मैं’ या ‘अहम’ है।

बर्तन की वजह से लगता है पानी दो भागों में बंट गया ; बर्तन की वजह से तुम एक अंदर और बाहर का अनुभव करने लगे। जब तक ‘मैं’ का भाव है, तुम्हें ऐसा ही अनुभव होता रहेगा, जब ‘मैं’ गायब हो जाता है तो जो रह जाता है, उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

14) अगर एक बार गोता लगाने से तुम्हें मोती न मिले, तुम्हें ये निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि समुद्र में रत्न नहीं होते।

15) जब एक कच्ची मिट्टी का बर्तन टूट जाता है तो कुम्हार उस गीली मिट्टी से नया बना देता है ; परंतु यदि एक मिट्टी का पका हुआ बर्तन टूट जाए तो फिर उससे नया नहीं बन सकता। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति अज्ञान की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होता है, वो दोबारा पैदा होता है ; परंतु जब वो सच्चे ज्ञान की आग में पक जाता है और एक आदर्श व्यक्ति के रूप में मरता है, तो उसका दोबारा जन्म नहीं होता।

16) मन ही व्यक्ति को बांधता है, मन ही व्यक्ति को मुक्त करता है। जो भी पक्के दृढ़ विश्वास से कहता है ‘मैं बंधा हुआ नहीं हूँ, मैं मुक्त हूँ’ वो मुक्त हो जाता है। वो मूर्ख है जो हमेशा रटता रहता है : ‘मैं बंधन में हूँ, मैं बंधा हुआ हूँ’, वो हमेशा वैसा ही रह जाता है। जो बार-बार दिन और रात ये रटता रहता है : ‘मैं पापी हूँ, मैं पापी हूँ’, वो वाकई पापी ही बन जाता है।

17) जो व्यक्ति दूसरों की बिना किसी भी स्वार्थपूर्ण उद्देश्य से मदद करता है, वो असल में खुद के लिए अच्छे का निर्माण कर रहा होता है।

18) हरे बांस को आसानी से मोड़ा जा सकता है, किन्तु पके हुए बांस को जब ताकत लगाकर मोड़ा जाता है तो वो टूट जाता है। एक युवा हृदय को भगवान की तरफ मोड़ना आसान है, किन्तु एक वृद्ध व्यक्ति के अनाड़ी हृदय को भगवान की ओर लाने पर वो भाग-भाग जाता है।

19) कौन किसका गुरु है ? एकमात्र ईश्वर ही सबके गाइड (पथप्रदर्शक) और ब्रह्मांड के गुरु हैं।

20) सामान्य आदमी झोला भरकर धर्म की बातें करता है किन्तु खुद के व्यवहार में एक दाना बराबर नहीं लाता। एक बुद्धिमान व्यक्ति बातें बहुत थोड़ी करता है, जबकि उसका पूरा जीवन धर्म के वास्तविक व्यवहार का प्रदर्शन होता है।

Swami Ramkrishna Paramhans Suvichar in hindi – स्वामी रामकृष्ण परमहंस के उपदेश व सुविचार 

21) ईश्वर ऐसे भक्त के समक्ष खुद को प्रकट कर देते हैं जो 3 आकर्षण के बराबर शक्ति से उनकी ओर जाता है : एक सांसारिक आदमी को सांसारिक सुखों का आकर्षण, एक बच्चे का अपने माँ के प्रति आकर्षण और एक पति का अपनी पवित्र पत्नी के लिए आकर्षण। यदि कोई इन 3 आकर्षण के बराबर ताकत से परमात्मा की ओर जाता है तो वो ईश्वर को पा लेता है।

22) तुम दुनिया का भला करने की बात करते हो ? क्या संसार इतनी छोटी वस्तु है ? और तुम कौन हो जो विश्व का कल्याण करोगे ? पहले ईश्वर को प्राप्त करो, आध्यात्मिक अनुशासन के द्वारा उनके दर्शन करो। यदि परमात्मा तुम्हें शक्ति और आदेश देते हैं तो तुम दूसरों का भला कर सकते हो, अन्यथा नहीं।

23) एक व्यक्ति चाहे तो दिये की रोशनी में भागवत पढ़ सकता है और दूसरा उसी के प्रकाश में जालसाजी कर रहा हो सकता है ; किन्तु इन सब से दिये को कोई फर्क नहीं पड़ता। सूर्य अपना प्रकाश दुष्ट व्यक्ति और भले व्यक्ति दोनों को देता है।

24) अगर किसी सफेद कपड़े में छोटा सा भी दाग लग जाए, वो दाग देखेने में बहुत बुरा लगता है। इसी प्रकार किसी साधु का छोटे से छोटा दोष भी बहुत बड़ा प्रतीत होता है।

25) चीनी और बालू साथ मिल जाते हैं लेकिन चींटी बालू के कण छोड़ देती है और शक्कर के दाने बिन लेती है। इसी तरह एक संत बुरे लोगों से भी अच्छाइयों को ही ग्रहण करते हैं।

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26) एक नाव पानी में रहती है लेकिन पानी को नाव के अंदर नहीं होना चाहिए, नहीं तो नाव डूब जाएगी। आध्यात्मिक उन्नति के लिए अग्रसर व्यक्ति संसार में रहे तो कोई हर्ज नहीं लेकिन उसके मन में संसार की माया नहीं होनी चाहिए।

27) अगर तुम अपने आदर्श पर ध्यान केंद्रित करोगे तो उसके गुणों को तुम खुद में पैदा होता देखोगे। यदि तुम दिन और रात ईश्वर का ही चिंतन करते रहोगे तो तुम भी ईश्वर के समान ही बन जाओगे।

28) सच तो ये है कि जब तक तुम्हारे मन में जरा सा भी इच्छाएं, वासनायें बाकी हैं तुम भगवान को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकोगे। धर्म की गति सूक्ष्म होती है। अगर तुम सुई में धागा डालने की कोशिश कर रहे हो, तो तुम तब तक सफल नहीं होगे जब तक धागे का एक भी रेशा टेढ़ा हो।

29) अगर दाद रोग की जगह खुजलाओ तो अच्छा लगता है लेकिन खुजलाने के बाद वहाँ दर्द और जलन होने लगती है। इसी तरह संसार के सुख शुरू में बड़े आकर्षक लगते हैं परंतु उनके परिणाम भयानक और सहन करने में कष्टकारी होते हैं।

30) कम्पस की चुंबकीय सुई हमेशा उत्तर दिशा की ओर इशारा करती है और इसकी वजह से पानी का जहाज आगे बढ़ते हुए अपनी दिशा से नहीं भटकता। इसी प्रकार जब तक व्यक्ति का हृदय ईश्वर में लगा रहता है, वो सांसारिक माया के समुद्र में भटकने से बच जाता है।

31) अगर तुम पूर्व दिशा में जाना चाहते हो तो पश्चिम दिशा में मत जाओ।

32) ये सत्य है कि भगवान एक शेर में भी है, लेकिन हमें जाकर उसका सामना नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार ये सत्य है कि ईश्वर सबसे दुष्ट के अंदर भी निवास करता है परंतु हमें दुष्ट से जुड़ना नहीं रखना चाहिए।

33) अलग-अलग व्यक्ति विभिन्न नामों से ईश्वर का नाम लेते हैं। कोई अल्लाह कहता है, कुछ लोग गॉड कहते हैं और कुछ कृष्ण, शिव और ब्रह्म कहते हैं। ये झील में भरे हुए पानी के समान है। झील के एक किनारे से कोई पानी पीता है और उसे ‘जल’ कहता है। दूसरा अलग किनारे से पीकर उसे ‘पानी’ बोलता है और कुछ लोग अलग जगह से उसी को पीकर ‘वॉटर’ कहता है। हिन्दू ने उसे ‘जल’ कहा और मुस्लिम ने ‘पानी’। किन्तु वह तो एक और एकमात्र ही वस्तु है।

34) सबको प्रेम करो, कोई भी तुमसे अलग नहीं है।

35) जब तक मधुमक्खी फूल की पंखुड़ियों से बाहर है और उसने पराग के मीठेपन को नहीं चखा है, वो फूल के चारों ओर गुंजन करती हुई मंडराती रहती है ; परंतु जब वो फूल के अंदर आ जाती है, तो शांत बैठकर पराग पीने का आनंद लेती है। इसी प्रकार जब तक मनुष्य मत और सिद्धांतों को लेकर बहस और झगड़ा करता रहता है, उसने सच्चे विश्वास के अमृत को नहीं चखा है ; जब उसे ईश्वरीय आनंद अमृत का स्वाद मिल जाता है, वो चुप और शांति से भरपूर हो जाता है।

36) बहुत ज्यादा ग्रंथ पढ़ना लाभ से ज्यादा नुकसान करते हैं। जरूरी बात है ग्रंथों के सार को जानना, समझना। उसके बाद फिर किताबों की क्या आवश्यकता ? व्यक्ति को सार समझना चाहिए और फिर ईश्वर को अनुभव करने के लिए गहरा गोता लगाना चाहिए।

37) छोटे बच्चे कमरे में गुड़ियों से खेलते रहते हैं, बिना किसी डर या बंधन के। परंतु जैसे ही उनकी माँ कमरे में प्रवेश करती है, वे गुड़ियों को फेंककर ‘माँ-माँ’ चिल्लाते हुए उसकी ओर भागते हैं। तुम भी सांसारिक जगत में खेल रहे हो, धन, मान, प्रसिद्धि आदि की गुड़ियों से आकर्षित होकर। लेकिन अगर तुम एक बार अपनी जगन्माता को देख लो, उसके बाद तुमको सांसारिक वस्तु में आनंद नहीं आएगा। तुम सब कुछ एक तरफ फेंककर, उनकी ओर भागोगे।

38) तुम संसार में रहकर गृहस्थी चला रहे तो इसमें हानि नहीं परंतु तुम्हें अपना मन ईश्वर की ओर रखना चाहिए। एक हाथ से कर्म करो और दूसरे हाथ से ईश्वर को पकड़े रहो। जब संसार में कर्मों का अंत हो जाएगा तो दोनों हाथों से ईश्वर के चरणों को पकड़ना। जैसे अगर किसी की पीठ में घाव हो जाए तो वो लोगों से बातचीत और दूसरे व्यवहार आदि तो करता है परंतु उसका मन हर समय उस घाव के दर्द की ओर ही पड़ा रहता है।

39) यदि तुम हाथ में तेल लगाकर कच्चे कटहल को काटो तो तुम्हारे हाथ में उसका दूध नहीं चिपकेगा, इसी तरह ब्रह्म ज्ञान लाभ कर लेने के बाद संसार में रहो तो तुम्हें कामिनी, कंचन की बाधा नहीं होगी।

40) जिस प्रकार बालक एक हाथ से खंबा पकड़कर जोरों से गोल-गोल घूमता है, उसे गिर पड़ने का डर नहीं होता। उसी प्रकार ईश्वर को पक्का पकड़कर संसार के सभी काम करो, इससे तुम विपत्ति से मुक्त रहोगे ।

41) सच्चे साधु की क्या पहचान है ? जिसका मन, प्राण, अंतरात्मा पूरी तरह ईश्वर में ही समर्पित हो वही सच्चा साधु है। सच्चा साधु कामिनी, कांचन का सम्पूर्ण त्याग कर देता है। वो स्त्रियों की ओर ऐहिक दृष्टि से नहीं देखता, वो सदा स्त्रियों से दूर रहता है। और यदि उसके पास कोई स्त्री आए तो वो उसे माता के समान देखता है। वो सदा ईश्वर चिंतन में मग्न रहता है और सर्वभूतों में ईश्वर विराजमान हैं, ये जानकर सबकी सेवा करता है। ये सच्चे साधु के कुछ साधारण लक्षण हैं। जो साधु दवाई देता हो, झाड़-फूँक करता हो, पैसे लेता हो और भभूत रमाकर या मला-तिलक आदि बाह्य चिन्हों का आडंबर रचकर मानों साइनबोर्ड लगाकर लोगों के सामने अपनी साधुगीरी का प्रदर्शन करता हो, उसपर कभी विश्वास मत करना।

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शब्दबीज संपादक पिछले 5 वर्षों से हिन्दी में विभिन्न विषयों पर अच्छे लेखों का प्रकाशन कर रही है। हमारा उद्देश्य है कि सही जानकारी, अनुसंधान और गुणवत्ता पूर्ण लेख से हमारे पाठकों का ज्ञानवर्धन हो।

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