11 गुरु मंत्र से गुरु पूजा वंदना करें | Guru Mantra in hindi

अपने गुरुओं की पूजा करने के लिए गुरु मंत्र का जाप (Guru Mantra in hindi) से गुरु का स्मरण करें और उनका आशीर्वाद, कृपा प्राप्त करें। गुरु का हिन्दू धर्म में बहुत ऊंचा स्थान है। गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान से ही हमारे अज्ञान का नाश होता है और हमारे जीवन को दिशा मिलती है। 

1) गुरु मंत्र – Guru mantra in Hindi text & Guru Mantra meaning in hindi

अपने गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करने और उनकी अर्चना करने के लिए नीचे दिए गए गुरु मंत्र का पाठ करें।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

अर्थ – गुरु ही मनुष्य के जीवन का ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समान कल्याण, बुद्धि-विचार का विकास और अनुशासन, मार्गदर्शन से जीवन को सफल बनाने का पथ दिखाता है। इसलिए गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही महेश अर्थात भगवान शिव हैं। साक्षात परब्रह्म परमात्मा ही हमारे उद्धार के लिए गुरु रूप में प्रकट होते हैं और ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं। अतः मैं ऐसे महान सद्गुरु को प्रणाम करता हूँ।

2) गुरु गायत्री मंत्र – Guru Gayatri mantra in hindi

ॐ वेदाहि गुरु देवाय विद्महे परम गुरुवे धीमहि तन्नौ: गुरु: प्रचोदयात्।

3) नमामि महादेवं देवदेवं, भजामि भक्तोदय भास्करम तं | ध्यायामि भूतेश्वर पाद्पंकजम, जपामि शिष्योद्धर नाम रूपं

4) ॐ त्वमा वह वहै वद वै गुरौर्चन घरै सह प्रियन्हर्शेतु I

अर्थ – हे गुरुदेव ! आप सर्वज्ञ हैं, हम इश्वर को नहीं पहचानते, उन्हें नहीं देखा है, पर आपको देखा है और आपके द्वारा ही उस प्रभु के दर्शन सहेज, संभव हैं | हम अपने ह्रदय को समर्पित कर आपका अर्चन पूजन करके पूर्णता प्राप्त करने आकांक्षी हैं।

गुरु मंत्र हिन्दी

5) ॐ शिवरूपाय महत् गुरुदेवाय नमः

6) ॐ परमतत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:।

7) ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

8) ॐ जेत्रे नम:

9) ॐ गुरुभ्यों नम:।

10) ॐ धीवराय नम:

11) ॐ गुणिने नम:

गुरु 2 प्रकार के होते हैं। एक जो हमें पढ़ाई-शिक्षा के माध्यम से ज्ञान का बोध कराते हैं और दूसरे वे गुरु जो हमें इस माया रूपी संसार के अज्ञान से मुक्त कराते हैं। इस अतिरिक्त भी हर वो व्यक्ति, जीव, जड़-चेतन वस्तु हमारा गुरु ही है जो हमें किसी न किसी रूप में कोई कल्याणकारी शिक्षा देता है। आइए इसे इस कहानी से समझते हैं।

एक बार आदि शंकराचार्य नदी से स्नान करके वापस लौट रहे थे तो उनके मार्ग में एक चांडाल आ गया। शंकराचार्य जी ने उसे अपने रास्ते से हट जाने को कहा क्योंकि यदि चांडाल से उनका शरीर स्पर्श हुआ तो वे अपवित्र हो जायेंगे। चांडाल ने उनसे कहा – आप किसे हटने के लिए कह रहे हैं ? मेरे शरीर को या मेरी आत्मा को ? आप मेरे छूने से क्यों अपवित्र हो जाएंगे ? क्योंकि मेरा चांडाल शरीर और आपका ब्राह्मण शरीर दोनों ही पंचतत्व से बना हुआ है। आपके और मेरे अंदर निवास करने वाली आत्मा उसी परब्रह्म परमात्मा का अंश है जोकि संसार के हर जीव में विद्यमान है। हमारी आत्माओं में कोई भिन्नता नहीं है। जब हम एक ही तत्व और आत्मन से बने है तो अप मुझे हटने के लिए कैसे कह सकते हैं। चांडाल के वचन सुनकर शंकराचार्य को ज्ञान हुआ कि इस सामान्य चांडाल ने कितनी उच्च ज्ञानपूर्ण बात कही है। शंकराचार्य ने चांडाल को गुरु कह कर उसे साष्टांग प्रणाम किया और उस ज्ञान पर आधारित ‘मनीष पंचकम’ स्तोत्र की रचना की।

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गुरु की महिमा का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। स्वयं भगवान ने जब अवतार लिया तो उन्होंने भी अपने गुरुओं के चरण में बैठकर ज्ञान अर्जन किया। ईश्वर जो खुद सभी ज्ञान का स्रोत हैं उन्होंने भी गुरु का आदर-सम्मान करके मनुष्य के लिए एक आदर्श स्थापित किया। भगवान ने यह लीला हमें समझाने के लिए की जिससे हम गुरु की महत्ता समझे और अपने जीवन के उद्धार के लिए सद्गुरु का आश्रय लेने का महत्व समझ सकें।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) एक ऐसा ही पर्व है जोकि हिन्दू कैलंडर के अनुसार आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन यदि आपके कोई गुरु हैं तो उनके समक्ष जाकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। अन्यथा अपने मन में ही ऊपर दिए गए गुरु मंत्र का जाप करते हुए गुरु का स्मरण, चिंतन और वंदना करनी चाहिए।

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