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	Comments on: वह शक्ति हमें दो दयानिधे के लेखक कौन हैं &#124; Vah Shakti Hamen do Dayanidhe PDF	</title>
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	<description>Best knowledge in hindi</description>
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		<title>
		By: Pramod Kumar Pandey.		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Pramod Kumar Pandey.]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Aug 2023 08:52:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महोदय, डॉ. सत्येन्द्र शर्मा जी एवं श्री हरिओम गोयल के, विश्लेषणात्मक अध्ययन पर आधारित विचार, सत्य एवं प्रशंसनीय हैं, एवं विश्वास योग्य हैं.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>महोदय, डॉ. सत्येन्द्र शर्मा जी एवं श्री हरिओम गोयल के, विश्लेषणात्मक अध्ययन पर आधारित विचार, सत्य एवं प्रशंसनीय हैं, एवं विश्वास योग्य हैं.</p>
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		<title>
		By: प्रमोद कुमार पाण्डेय एड्वोकेट सतना म .प्र .		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद कुमार पाण्डेय एड्वोकेट सतना म .प्र .]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Aug 2023 08:00:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महोदय, आदरणीय डाक्टर सत्येन्द्र शर्मा जी एवं सम्माननीय श्री हरिओम गोयल जी ने अपने विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर जो विचार व्यक्त किए हैं, वे पूर्णतया सत्य पर आधारित हैं, क्यों कि &quot;वह शक्ति हमें दो दयानिधे&quot;के रचयिता स्वर्गीय पंडित परशुराम पाण्डेय जी, मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री वीरेन्द्र कुमार पाण्डेय, रिटायर्ड एस .पी., के पिताजी थे, अर्थात मेरे दादाजी थे, जिनका साथ एवं आशीर्वाद मुझे, मेरे जन्म के समय सन् 1957 से, मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी के स्वर्गवास के समय सन् 1982 तक प्राप्त हुआ। आपने मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी को, साहित्यिक सम्मान के साथ याद रखा, इसके लिए मेरा पूरा परिवार, हृदय से आपका आभारी है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>महोदय, आदरणीय डाक्टर सत्येन्द्र शर्मा जी एवं सम्माननीय श्री हरिओम गोयल जी ने अपने विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर जो विचार व्यक्त किए हैं, वे पूर्णतया सत्य पर आधारित हैं, क्यों कि &#8220;वह शक्ति हमें दो दयानिधे&#8221;के रचयिता स्वर्गीय पंडित परशुराम पाण्डेय जी, मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री वीरेन्द्र कुमार पाण्डेय, रिटायर्ड एस .पी., के पिताजी थे, अर्थात मेरे दादाजी थे, जिनका साथ एवं आशीर्वाद मुझे, मेरे जन्म के समय सन् 1957 से, मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी के स्वर्गवास के समय सन् 1982 तक प्राप्त हुआ। आपने मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी को, साहित्यिक सम्मान के साथ याद रखा, इसके लिए मेरा पूरा परिवार, हृदय से आपका आभारी है।</p>
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		<title>
		By: प्रमोद कुमार पाण्डेय एड्वोकेट सतना म .प्र .		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद कुमार पाण्डेय एड्वोकेट सतना म .प्र .]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Aug 2023 15:42:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[डाक्टर सत्येन्द्र शर्मा एवं श्री हरिओम गोयल की टिप्पणी, सत्यता पर आधारित है, क्यों कि &quot;&quot;वह शक्ति हमें दो दयानिधे&quot;&quot;कविता एवं प्रार्थना के रचयिता स्वर्गीय पंडित परशुराम पाण्डेय, मेरे दादाजी थे,जिनका साथ एवं आशीर्वाद मुझे,जन्म के समय से लेकर 25 वर्ष की उम्र तक मिला था।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>डाक्टर सत्येन्द्र शर्मा एवं श्री हरिओम गोयल की टिप्पणी, सत्यता पर आधारित है, क्यों कि &#8220;&#8221;वह शक्ति हमें दो दयानिधे&#8221;&#8221;कविता एवं प्रार्थना के रचयिता स्वर्गीय पंडित परशुराम पाण्डेय, मेरे दादाजी थे,जिनका साथ एवं आशीर्वाद मुझे,जन्म के समय से लेकर 25 वर्ष की उम्र तक मिला था।</p>
]]></content:encoded>
		
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		<title>
		By: प्रमोद कुमार पाण्डेय, एड्वोकेट, सतना,म.प्र.		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद कुमार पाण्डेय, एड्वोकेट, सतना,म.प्र.]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Aug 2023 11:25:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19069&quot;&gt;हरिओम गोयल&lt;/a&gt;.

महोदय, श्री हरिओम गोयल जी का विश्लेषण सत्यता पर आधारित है, क्यों कि &quot;&quot;वह शक्ति हमें दो दयानिधे &quot;&quot;कविता एवं प्रार्थना के रचयिता, स्वर्गीय पंडित परशुराम पाण्डेय, मेरे पिता जी श्री वीरेन्द्र कुमार पाण्डेय, रिटायर्ड एस .पी., के पिताजी थे, अर्थात मेरे दादाजी थे, जिनके प्रेमपूर्ण एवं शिक्षाप्रद सानिध्य मे मेरा बचपन बीता था ,और 14 एवं 15 वर्ष की उम्र में सन् 1972 एवं सन् 1973 के 2 वर्षों में मुझे लगातार उनके साथ रहने का अवसर मिला ,जिस दौरान मैंने पाया कि वे जीवन शैली एवं सिद्धांतों के सम्बन्ध में, पूरी तरह से भगवान् श्री राम से प्रभावित थे । इसलिए वे जातिगत भेदभाव से दूर रहते थे। चूंकि उस समय भारत पर अंग्रेजों का शासन था, और अनेक सम्पन्न भारतीय परिवार,अंग्रेजों की जीवन शैली अपनाने में अपनी शान समझते थे, इसलिए भारतीयों को, भारतीय  संस्कारों को दृढ़तापूर्वक स्थापित करने के लिए एवं आपस में एकता बनाए रखने के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से, उन्होंने, उक्त कविता एवं प्रार्थना की रचना की थी। चूंकि उस समय के रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव, मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी से व्यक्तिगत रूप से बहुत अधिक प्रभावित थे, एवं स्वयं अपना, दशहरा के अवसर पर, रीवा की जनता के सामने दिया जाने वाला भाषण, स्थानीय बोली भाषा में, मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी से व्यक्तिगत रूप से तैयार करवाते थे, और उन्होंने दादाजी को प्रधानाध्यापक के पद हटा कर,तीन गुना अधिक वेतन वाले पद शासकीय मुद्रणालय ( गवर्नमेंट प्रेस) के अधीक्षक के पद पर पदस्थ कर दिया था, इसलिए उन्होंने 
 दादाजी द्वारा रचित उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना &quot;&quot;वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जायें &quot;&quot;को, रीवा राज्य के सभी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्रारंभिक प्रार्थना के रूप में अनिवार्य कर दिया था और उनके अच्छे सम्बंध एवं सम्पर्क वाले राज्यों एवं रियासतों के राजाओं को भी समझा कर, उक्त कविता एवं प्रार्थना को, उनके राज्यों के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्रारंभिक प्रार्थना के रूप में अनिवार्य करवा दिया था।जिस कविता एवं प्रार्थना में &quot;देश&quot;एवं&quot;जाति&quot;शब्द का स्पष्ट रूप से अभिप्राय,भारत में रहने वाले प्रत्येक भारतीय से था और है, क्यों कि उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना, हमेशा भारतीयों को, भारतीय संस्कारों एवं जीवन मूल्यों को, दृढ़तापूर्वक स्थापित करने हेतु प्रेरित करती रहेगी, जो भारत की अखण्डता एवं भारत की मजबूती के लिए आवश्यक है। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी का बचपन एवं युवावस्था का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था, क्यों कि जब वे 12 वर्ष के थे, तभी उनके पिताजी, जो पोस्ट मास्टर थे,का अचानक स्वर्गवास हो गया था। चूंकि उसी वर्ष दादाजी ने मिडिल क्लास की परीक्षा में पूरे रीवा राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया था, इसलिए रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा द्वारा उन्हें शिक्षक पद पर नियुक्ति दे दी गई थी।उस समय दादाजी, अपने परिवार के साथ ग्राम दुआरी, तहसील गुढ़, जिला रीवा,म.प्र.मे रहते थे। दादाजी बचपन से ही साहित्य में रुचि रखते थे, और विन्ध्यप्रदेश के साहित्यिक समाज से जुड़े रहते थे। इसलिए जब उन्हें पदोन्नति पर उपरहटी स्कूल रीवा में प्रधानाध्यापक पद पर पदस्थ किया गया, तो उनकी साहित्यिक विकास यात्रा को अनुकूल वातावरण मिल गया और यहीं पर वे, रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव के सम्पर्क में आए, जिनके साथ मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी की प्रगाढ़ता का साक्षी, विन्ध्यप्रदेश का साहित्यिक समाज है। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी द्वारा रचित उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना की लोकप्रियता का प्रभाव मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में बढते देख कर, और मेरे दादाजी के समर्थन में रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव को देखकर, अंग्रेजों ने, अनेक बनावटी मामलों को तैयार करके, रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव को, रीवा राज्य के सिंहासन से हटा दिया एवं उनके नाबालिग पुत्र श्री मार्तण्ड सिंह जूदेव को रीवा राज्य का महाराजा घोषित कर दिया। इसके बाद महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव का शेष जीवन मुम्बई में बीता।इसके अतिरिक्त मेरे दादाजी एवं उनके परिवार पर भी, अंग्रेजों द्वारा सख़्त निगरानी रखी गई। दादाजी के पास लगातार 2 वर्ष रहने के दौरान, मुझे दादाजी द्वारा रचित और प्रकाशित,अनेक कविताएं,लेख, प्रार्थनाएं,भजन एवं आरती, उनके पास मौजूद पुस्तकों एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़ने और उनके अर्थ एवं भावार्थ, स्वयं दादाजी से समझने का अवसर प्राप्त हुआ, जिसके लिए मैं, ईश्वर का आभारी हूं। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी की अनेक रचनाएं, उस समय की सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका &quot;&quot;सरस्वती &quot;&quot;में भी प्रकाशित हुई थी। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी का स्वर्गवास, सन् 1982 में, गर्मी के मौसम में, एकादशी की तिथि को हुआ था।उस समय मैं दादाजी के पास ही था। पानी पीने के बाद अन्तिम समय में दादाजी की नाड़ी की गति क्रमशः पैरों से घटना शुरू हुई थी, जो हाथों से होते हुए, गले में जाकर समाप्त हो गई थी,जिस पूरी अवधि में  दादाजी के चेहरे पर पूरी तरह से शान्ति थी। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वे अपने अन्तिम समय के बारे में पहले से ही जानते थे। अपने जीवन काल में सामान्य चर्चा के दौरान, दादाजी ने अनेक बार मुझसे कहा,कि मुझे ऐसा लगता है कि मेरी मृत्यु, एकादशी को होगी। अभी मेरे साफ्टवेयर इंजीनियर पुत्र मृत्युंजय पाण्डेय ने मुझे बताया कि मेरे दादाजी द्वारा रचित उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना में लेखक का नाम किसी अन्य व्यक्ति का लिखकर, इन्टरनेट में, वेबसाईट पर डाल दिया गया है,तब मैंने उस वेबसाईट को खोल कर देखा, तो मेरे बेटे मृत्युंजय पाण्डेय की बात सही साबित हुई। मैं तो यह नहीं जानता कि ऐसा शर्मनाक कृत्य किसने किया है, किन्तु जिसने भी यह कृत्य किया है,वह अक्षम्य और निन्दनीय है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19069">हरिओम गोयल</a>.</p>
<p>महोदय, श्री हरिओम गोयल जी का विश्लेषण सत्यता पर आधारित है, क्यों कि &#8220;&#8221;वह शक्ति हमें दो दयानिधे &#8220;&#8221;कविता एवं प्रार्थना के रचयिता, स्वर्गीय पंडित परशुराम पाण्डेय, मेरे पिता जी श्री वीरेन्द्र कुमार पाण्डेय, रिटायर्ड एस .पी., के पिताजी थे, अर्थात मेरे दादाजी थे, जिनके प्रेमपूर्ण एवं शिक्षाप्रद सानिध्य मे मेरा बचपन बीता था ,और 14 एवं 15 वर्ष की उम्र में सन् 1972 एवं सन् 1973 के 2 वर्षों में मुझे लगातार उनके साथ रहने का अवसर मिला ,जिस दौरान मैंने पाया कि वे जीवन शैली एवं सिद्धांतों के सम्बन्ध में, पूरी तरह से भगवान् श्री राम से प्रभावित थे । इसलिए वे जातिगत भेदभाव से दूर रहते थे। चूंकि उस समय भारत पर अंग्रेजों का शासन था, और अनेक सम्पन्न भारतीय परिवार,अंग्रेजों की जीवन शैली अपनाने में अपनी शान समझते थे, इसलिए भारतीयों को, भारतीय  संस्कारों को दृढ़तापूर्वक स्थापित करने के लिए एवं आपस में एकता बनाए रखने के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से, उन्होंने, उक्त कविता एवं प्रार्थना की रचना की थी। चूंकि उस समय के रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव, मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी से व्यक्तिगत रूप से बहुत अधिक प्रभावित थे, एवं स्वयं अपना, दशहरा के अवसर पर, रीवा की जनता के सामने दिया जाने वाला भाषण, स्थानीय बोली भाषा में, मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी से व्यक्तिगत रूप से तैयार करवाते थे, और उन्होंने दादाजी को प्रधानाध्यापक के पद हटा कर,तीन गुना अधिक वेतन वाले पद शासकीय मुद्रणालय ( गवर्नमेंट प्रेस) के अधीक्षक के पद पर पदस्थ कर दिया था, इसलिए उन्होंने<br />
 दादाजी द्वारा रचित उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना &#8220;&#8221;वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जायें &#8220;&#8221;को, रीवा राज्य के सभी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्रारंभिक प्रार्थना के रूप में अनिवार्य कर दिया था और उनके अच्छे सम्बंध एवं सम्पर्क वाले राज्यों एवं रियासतों के राजाओं को भी समझा कर, उक्त कविता एवं प्रार्थना को, उनके राज्यों के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्रारंभिक प्रार्थना के रूप में अनिवार्य करवा दिया था।जिस कविता एवं प्रार्थना में &#8220;देश&#8221;एवं&#8221;जाति&#8221;शब्द का स्पष्ट रूप से अभिप्राय,भारत में रहने वाले प्रत्येक भारतीय से था और है, क्यों कि उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना, हमेशा भारतीयों को, भारतीय संस्कारों एवं जीवन मूल्यों को, दृढ़तापूर्वक स्थापित करने हेतु प्रेरित करती रहेगी, जो भारत की अखण्डता एवं भारत की मजबूती के लिए आवश्यक है। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी का बचपन एवं युवावस्था का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था, क्यों कि जब वे 12 वर्ष के थे, तभी उनके पिताजी, जो पोस्ट मास्टर थे,का अचानक स्वर्गवास हो गया था। चूंकि उसी वर्ष दादाजी ने मिडिल क्लास की परीक्षा में पूरे रीवा राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया था, इसलिए रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा द्वारा उन्हें शिक्षक पद पर नियुक्ति दे दी गई थी।उस समय दादाजी, अपने परिवार के साथ ग्राम दुआरी, तहसील गुढ़, जिला रीवा,म.प्र.मे रहते थे। दादाजी बचपन से ही साहित्य में रुचि रखते थे, और विन्ध्यप्रदेश के साहित्यिक समाज से जुड़े रहते थे। इसलिए जब उन्हें पदोन्नति पर उपरहटी स्कूल रीवा में प्रधानाध्यापक पद पर पदस्थ किया गया, तो उनकी साहित्यिक विकास यात्रा को अनुकूल वातावरण मिल गया और यहीं पर वे, रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव के सम्पर्क में आए, जिनके साथ मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी की प्रगाढ़ता का साक्षी, विन्ध्यप्रदेश का साहित्यिक समाज है। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी द्वारा रचित उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना की लोकप्रियता का प्रभाव मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में बढते देख कर, और मेरे दादाजी के समर्थन में रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव को देखकर, अंग्रेजों ने, अनेक बनावटी मामलों को तैयार करके, रीवा राज्य के तत्कालीन महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव को, रीवा राज्य के सिंहासन से हटा दिया एवं उनके नाबालिग पुत्र श्री मार्तण्ड सिंह जूदेव को रीवा राज्य का महाराजा घोषित कर दिया। इसके बाद महाराजा श्री गुलाब सिंह जूदेव का शेष जीवन मुम्बई में बीता।इसके अतिरिक्त मेरे दादाजी एवं उनके परिवार पर भी, अंग्रेजों द्वारा सख़्त निगरानी रखी गई। दादाजी के पास लगातार 2 वर्ष रहने के दौरान, मुझे दादाजी द्वारा रचित और प्रकाशित,अनेक कविताएं,लेख, प्रार्थनाएं,भजन एवं आरती, उनके पास मौजूद पुस्तकों एवं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़ने और उनके अर्थ एवं भावार्थ, स्वयं दादाजी से समझने का अवसर प्राप्त हुआ, जिसके लिए मैं, ईश्वर का आभारी हूं। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी की अनेक रचनाएं, उस समय की सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका &#8220;&#8221;सरस्वती &#8220;&#8221;में भी प्रकाशित हुई थी। मेरे दादाजी श्री परशुराम पाण्डेय जी का स्वर्गवास, सन् 1982 में, गर्मी के मौसम में, एकादशी की तिथि को हुआ था।उस समय मैं दादाजी के पास ही था। पानी पीने के बाद अन्तिम समय में दादाजी की नाड़ी की गति क्रमशः पैरों से घटना शुरू हुई थी, जो हाथों से होते हुए, गले में जाकर समाप्त हो गई थी,जिस पूरी अवधि में  दादाजी के चेहरे पर पूरी तरह से शान्ति थी। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वे अपने अन्तिम समय के बारे में पहले से ही जानते थे। अपने जीवन काल में सामान्य चर्चा के दौरान, दादाजी ने अनेक बार मुझसे कहा,कि मुझे ऐसा लगता है कि मेरी मृत्यु, एकादशी को होगी। अभी मेरे साफ्टवेयर इंजीनियर पुत्र मृत्युंजय पाण्डेय ने मुझे बताया कि मेरे दादाजी द्वारा रचित उपरोक्त कविता एवं प्रार्थना में लेखक का नाम किसी अन्य व्यक्ति का लिखकर, इन्टरनेट में, वेबसाईट पर डाल दिया गया है,तब मैंने उस वेबसाईट को खोल कर देखा, तो मेरे बेटे मृत्युंजय पाण्डेय की बात सही साबित हुई। मैं तो यह नहीं जानता कि ऐसा शर्मनाक कृत्य किसने किया है, किन्तु जिसने भी यह कृत्य किया है,वह अक्षम्य और निन्दनीय है।</p>
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		<title>
		By: राजेन्द्र प्रसाद मिश्र		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र प्रसाद मिश्र]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Aug 2023 23:53:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18413&quot;&gt;Amit Katiyar&lt;/a&gt;.

रचनाकार की रचना को हू बहू स्वीकार किया जाना चाहिए उसमें तोड़ मडोर की आवश्यकता कहीं नहीं है उसे व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो अधिक अच्छा होगा। यहां जाति शब्द का व्यापक अर्थ मानव जाति से है बान का अर्थ भी बंशअथवा मानव जाति से है]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18413">Amit Katiyar</a>.</p>
<p>रचनाकार की रचना को हू बहू स्वीकार किया जाना चाहिए उसमें तोड़ मडोर की आवश्यकता कहीं नहीं है उसे व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो अधिक अच्छा होगा। यहां जाति शब्द का व्यापक अर्थ मानव जाति से है बान का अर्थ भी बंशअथवा मानव जाति से है</p>
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		<item>
		<title>
		By: Swati		</title>
		<link>https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19091</link>

		<dc:creator><![CDATA[Swati]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Jul 2023 16:37:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18413&quot;&gt;Amit Katiyar&lt;/a&gt;.

Manav jati ki baat ho rhi h]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18413">Amit Katiyar</a>.</p>
<p>Manav jati ki baat ho rhi h</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: ShabdBeej		</title>
		<link>https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19074</link>

		<dc:creator><![CDATA[ShabdBeej]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Jul 2023 11:27:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19069&quot;&gt;हरिओम गोयल&lt;/a&gt;.

बहुत सुंदर विचार :)]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19069">हरिओम गोयल</a>.</p>
<p>बहुत सुंदर विचार 🙂</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: हरिओम गोयल		</title>
		<link>https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-19069</link>

		<dc:creator><![CDATA[हरिओम गोयल]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2023 12:57:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">https://shabdbeej.com/?p=1646#comment-19069</guid>

					<description><![CDATA[संदर्भित कविता में देश-जाति के ऊपर अनेक विचार प्रस्तुत किये गये हैं और कुछ विद्वान जाति शब्द को अपनी मेधा के अनुसार वर्ण व्यवस्था से जोड़कर इसमें परिवर्तन और व्याख्या कर रहे हैं जो उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि कवि ने इतनी अच्छी कविता को इतने सीमित दायरे में रखकर तो नहीं ही लिखा होगा ऐसा मेरा विश्वास है।मेरा मानना है कि प्रत्येक देश की एक जाति होती है और वह है उसके मूल निवासियों की जाति यथा भारत के भारतीय वैसे ही अमेरिकी, जर्मन, फ्रांसीसी, अफ्रीकी इत्यादि।आज प्रवासन सामान्य सी बात है। विभिन्न देशों के लोग विभिन्न देशों में विभिन्न कारणों से बस रहे हैं।और कभी कभी वे उनके मूल निवासियों पर आधिपत्य स्थापित करने लगते हैं जैसे कि विगत में हमारे देश में ही अंग्रेजों ने किया,तो उस समय सभी देशवासियों ने उनका विरोध इसी देश-जाति की भावना से किया था ना कि वर्ण व्यवस्था की जाति प्रथा के अनुसार। अतः इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है और जाति शब्द का प्रयोग कवि ने इसी मंतव्य से किया है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान लोगों ने बलिदान वर्ण जाति से नहीं वरन् देश-जाति से प्रेरित होकर किया था। जीवविज्ञान के अनुसार भी एक क्षेत्र विशेष का डीएनए एक ही होता है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>संदर्भित कविता में देश-जाति के ऊपर अनेक विचार प्रस्तुत किये गये हैं और कुछ विद्वान जाति शब्द को अपनी मेधा के अनुसार वर्ण व्यवस्था से जोड़कर इसमें परिवर्तन और व्याख्या कर रहे हैं जो उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि कवि ने इतनी अच्छी कविता को इतने सीमित दायरे में रखकर तो नहीं ही लिखा होगा ऐसा मेरा विश्वास है।मेरा मानना है कि प्रत्येक देश की एक जाति होती है और वह है उसके मूल निवासियों की जाति यथा भारत के भारतीय वैसे ही अमेरिकी, जर्मन, फ्रांसीसी, अफ्रीकी इत्यादि।आज प्रवासन सामान्य सी बात है। विभिन्न देशों के लोग विभिन्न देशों में विभिन्न कारणों से बस रहे हैं।और कभी कभी वे उनके मूल निवासियों पर आधिपत्य स्थापित करने लगते हैं जैसे कि विगत में हमारे देश में ही अंग्रेजों ने किया,तो उस समय सभी देशवासियों ने उनका विरोध इसी देश-जाति की भावना से किया था ना कि वर्ण व्यवस्था की जाति प्रथा के अनुसार। अतः इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है और जाति शब्द का प्रयोग कवि ने इसी मंतव्य से किया है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान लोगों ने बलिदान वर्ण जाति से नहीं वरन् देश-जाति से प्रेरित होकर किया था। जीवविज्ञान के अनुसार भी एक क्षेत्र विशेष का डीएनए एक ही होता है।</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ सत्येन्द्र शर्मा		</title>
		<link>https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18962</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ सत्येन्द्र शर्मा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Apr 2023 12:34:30 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">https://shabdbeej.com/?p=1646#comment-18962</guid>

					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-16538&quot;&gt;ShabdBeej Team&lt;/a&gt;.

श्री रमाशंकर शर्मा के नाम से दर्शाई जा रही उक्त टिप्पणी वास्तव में हिन्दी के वरिष्ठ समालोचक डॉ सत्येन्द्र शर्मा की है । जो अभी भी रमाशंकर जी की उक्त तिथि वाली पोस्ट में Most Relevant  की श्रेणी में उनके नाम के साथ दर्ज है । इसलिए शब्जबीज की टीम से कपेक्षा है कि वे इसे सही नाम से उद्धत करें ।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-16538">ShabdBeej Team</a>.</p>
<p>श्री रमाशंकर शर्मा के नाम से दर्शाई जा रही उक्त टिप्पणी वास्तव में हिन्दी के वरिष्ठ समालोचक डॉ सत्येन्द्र शर्मा की है । जो अभी भी रमाशंकर जी की उक्त तिथि वाली पोस्ट में Most Relevant  की श्रेणी में उनके नाम के साथ दर्ज है । इसलिए शब्जबीज की टीम से कपेक्षा है कि वे इसे सही नाम से उद्धत करें ।</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: Ashish kumar maurya		</title>
		<link>https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18941</link>

		<dc:creator><![CDATA[Ashish kumar maurya]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 08:52:06 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">https://shabdbeej.com/?p=1646#comment-18941</guid>

					<description><![CDATA[In reply to &lt;a href=&quot;https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18491&quot;&gt;Shishu Pal&lt;/a&gt;.

जिस मातृभूमि में जन्म लिया बलिदान उसी पर हो जांवे
यही पहले के किताबों में था लेकिन इसमें देश जाति का वर्णन करके बहुत गलत किए है। हम इसका विरोध करते है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>In reply to <a href="https://shabdbeej.com/vah-shakti-hame-do-dayanidhe-kartavya-marg-par-dat-jave-writer-%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%8b/#comment-18491">Shishu Pal</a>.</p>
<p>जिस मातृभूमि में जन्म लिया बलिदान उसी पर हो जांवे<br />
यही पहले के किताबों में था लेकिन इसमें देश जाति का वर्णन करके बहुत गलत किए है। हम इसका विरोध करते है।</p>
]]></content:encoded>
		
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	</channel>
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