वास्तविक Psychological Experiment’ पर आधारित दो बढ़िया फिल्में देखिये

By | 05/02/2016

साल 2015 में वास्तविक मनोवैज्ञानिक परीक्षणों पर आधारित 2 फिल्में आई. पहली फिल्म थी “Experimenter” और दूसरी थी “The Stanford experiment“. इन फिल्मों का मुख्य विषय दो अलग-अलग मनोवैज्ञानिक परीक्षणों और उनके परिणामो पर आधारित था. इन दोनों परीक्षणों के परिणाम इतने आश्चर्यजनक थे कि इन्होंने पूर्व-प्रचलित मान्यताओं को हिला कर रख दिया और ये दोनों परीक्षण आगामी कई सालों तक, बड़े स्तर पर चर्चा और बहस का मुद्दा बनी.

Experimenter :

इस प्रयोग में कुछ लोगो को एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया. एक कमरे में आमंत्रित व्यक्ति को एक इलेक्ट्रिकल स्विचबोर्ड के सामने बैठा दिया जाता था और प्रश्नों और समाधानों की एक सूची दे जाती थी. अब उन्हें एक व्यक्ति से मिलवाया जाता था जोकि मनोवैज्ञानिक की टीम का ही हिस्सा था. मिलने के बाद टीम का व्यक्ति एक दूसरे बंद केबिन में बैठ जाता था, जिससे कि आमंत्रित व्यक्ति उसे देख नहीं पाता परन्तु उसकी आवाज़ सुन सकता था.

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आमंत्रित व्यक्ति को बताया जाता कि केबिन में बंद व्यक्ति को सामने के स्विचबोर्ड से जोड़ दिया गया है और आपको उससे सवाल के उत्तर पूछने है. गलत जवाब देने पर आपको स्विचबोर्ड को दबाना है जिससे कि केबिन के व्यक्ति को बिजली का हल्का झटका लगेगा. जैसे जैसे सूची में आगे बढ़ेंगे, गलत जवाब देने पर बिजली के झटको की तीव्रता बढती जाएगी. इस कमरे की गतिविधियों पर मनोवैज्ञानिक एक गुप्त जगह से नज़र रखे हुए थे. असल में केबिन में बंद व्यक्ति को कोई झटका नहीं लगता था, वो तो बस वहां बैठकर दर्द और चीख की आवाज़ से भरे के एक रिकॉर्ड को चला रहा होता था.

इस प्रयोग से ये चौकाने वाले परिणाम सामने आये कि कई स्त्री, पुरुष जोकि बड़े दयालु और सहृदय मालूम होते हैं, असल में दबाव और परिस्थिति के प्रभाव में क्रूर हो सकते हैं. वही कई ऐसे लोग जोकि देखने से सख्त मिजाज़ के लगते हैं, दबाव और प्रभाव के बावजूद अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन कर सही निर्णय लेते हैं और दया का भाव प्रदर्शित करते हैं. किस प्रकार कुछ लोग अपने सीनियर्स / मालिक के आदेशों का आंख बंद करके पालन करते हैं और वही कुछ लोग अपने विवेक के अनुसार चलते हैं.

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The Stanford experiment :

कैदियों और जेलकर्मियों के बर्ताव और उनकी मनोवैज्ञानिक स्थिति के बारे में जानने के लिए इस प्रयोग को बनाया गया था. इसमें स्टेनफोर्ड कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों को लिया गया. कॉलेज में ही एक प्रायोगिक जेल बनाई गयी. विद्यार्थियों की उनकी इच्छा के अनुसार जेल गार्ड और कैदी बनाया गया. इसके बाद कैदी लडको को उनके जेल में डाल दिया गया और गार्ड लड़कों से उनपर नज़र रखने और एक जेल गार्ड के तरह बर्ताव करने के लिए कहा गया.

शुरू में सभी को लगा इस परीक्षण से कुछ खास निर्णय सामने नहीं आने वाला था परन्तु प्रयोग के कुछ दिन बाद परिस्थितियां तेजी से बदली और इस प्रयोग में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के मानसिक स्थिति में ऐसे आश्चर्यजनक और गंभीर परिवर्तन आए कि इस प्रयोग को बीच में ही रोक देना पड़ा.

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इस प्रयोग में यह देखने में आया कि किस प्रकार कुछ लोग मुश्किल से मुश्किल परिस्थितयों में भी अपना मानसिक संतुलन बनाये रखते है और आशावादी बने रहते है जबकि उन्ही स्थितियों में अन्य लोग हिम्मत हार जाते हैं. यह प्रयोग यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार हमारे ऊपर आसपास के माहौल, वातावरण और लोगों के व्यवहार का गहरा असर पड़ता है.

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