सूर्य मंत्र के जाप से जीवन भर सफलता, समृद्धि, आरोग्य पाइए

सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता कहा जाता है. सूर्यदेव आदिकाल से विश्व की सभी घटनाओं के साक्षी और पृथ्वी पर जीवन के स्रोत हैं. सूर्यमंत्र के जाप से जीवन और करियर में सफलता, सुख-समृद्धि, आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है. सूर्यमन्त्र नियमित पढ़ने से आत्मविश्वास में गजब की वृद्धि होती है और दुनिया में यश-प्रसिद्धि फैलती है. बॉलीवुड एक्टर अक्षय कुमार वर्षों से नियमित प्रातःकाल के सूर्य का दर्शन और मन्त्रजप करते आये हैं. अक्षय कुमार की सफलता और नाम-यश के बारे में सब जानते ही हैं. इस पोस्ट में 3 सूर्यमंत्र और उनके जप के लाभ जानिए.

1. सूर्य बीज मंत्र :

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः “Om Hraam Hreem Hraum Sah Suryay Namah:”

इस मंत्र के जाप की शुरुआत किसी भी रविवार से कर सकते हैं. शीघ्र और इच्छित परिणाम के लिए 41 दिन तक प्रतिदिन 6 माला सूर्य बीज मंत्र का जाप करें.

सूर्य बीज मंत्र के फायदे : कुंडली में सूर्य की दशा खराब हो, स्वास्थ्य समस्या या नकारात्मकता के शिकार हों तो यह सूर्य बीज मंत्र आपको निश्चित रूप से लाभ दिला सकता है. इसके अतिरिक्त एक सुखद जीवन के लिए आवश्यक धन-धान्य, मानसिक शांति, आरोग्य और सत्बुद्धि का प्रसाद भी सूर्य बीज मन्त्र जाप से प्राप्त होता है. स्वास्थ्य की दृष्टि से आँखों के रोग, ह्रदय रोग, स्किन समस्या व असाध्य रोग से राहत पाने, नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए सूर्य बीज मंत्र जप खास प्रभावी माना गया है.

सूर्य बीज मंत्र के अन्य संस्करण :

ऊँ घृणिः सूर्य आदिव्योम – व्यवसाय में वृद्धि के लिए
शत्रु नाशाय ऊँ हृीं हृीं सूर्याय नमः – शत्रुओं के नाश के लिए
ऊँ हृां हृीं सः – सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए
ऊँ हृीं श्रीं आं ग्रहधिराजाय आदित्याय नमः – अनिष्ट ग्रहों की दशा के निवारण के लिए

2. सूर्य गायत्री मंत्र :

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि l तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् ।।

सूर्य गायत्री मंत्र जाप के फायदे – इस मंत्र के जाप का सबसे अच्छा समय सूर्यग्रहण के दिन और रविवार सुबह सूर्योदय के समय होता है. अगर इस मंत्र का जाप प्रतिदिन ध्यानपूर्वक और विश्वास के साथ किया जाये तो अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जोकि आपके जीवन को भगवान सूर्य का दिव्य अनुग्रह प्रदान करती है. यह शरीर और मन मजबूत बनाता है, विचार और मनोवृति में शुद्धता आती है जोकि लक्ष्य प्राप्ति में आवश्यक है. इस प्रकार यह सूर्य गायत्री मन्त्र प्रसिद्धि और सफलता दिलाने में प्रभावकारी है.

3. आदित्य हृदय स्तोत्र :

इस स्रोत के नियमित पाठ से संघर्षों, समस्याओं को पार करने की शक्ति और सफलता मिलती है. एक प्रयोग में यह पाया गया कि जो भी विद्यार्थी नियमित आदित्य हृदय स्तोत्र का जाप करते थे, उनमें बुद्धि और आत्मविश्वास की निरंतर वृद्धि देखी गयी. इसके अतिरिक्त अन्य को जॉब में प्रमोशन और करियर, व्यवसाय में उन्नति का लाभ भी मिला. सर्व कल्याणकारी यह मन्त्र पाप, मानसिक कष्ट, शत्रुओं से मुक्ति दिलाता है और उर्जा, स्वास्थ्य, विजय का फल प्रदान करता है.

राम-रावण युद्ध के दौरान भगवान राम थकान और निराशा के शिकार होने लगे थे. उसी समय अगस्त्य मुनि वहाँ आये और उन्होंने राम को 3 बार आदित्य हृदय स्तोत्र जाप करने को कहा. आदित्य हृदय स्तोत्र के 3 पाठ से भगवान राम की सारी थकान और निराशा जाती रही और शरीर में स्फूर्ति और मन में दिव्य आत्मविश्वास आ गया. इसके पश्चात भगवान राम ने वीरतापूर्वक रावण से युद्ध किया और विजय प्राप्त की.

आदित्य हृदय स्तोत्र का जाप कैसे करें – प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठें. नहा-धोकर, स्वच्छ सफेद या लाल कपड़ा पहनकर ताम्बे के लोटे में जलभर के सूर्यदेव को जल चढ़ाएं. जल में रोली या लाल चन्दन, लाल फूल डालें. इसके बाद सूर्य के समक्ष आसन बिछाकर बैठें. अगर सूर्य के सामने न बैठ पायें तो घर के पूजा-स्थल या किसी मन्दिर में भी बैठ कर पाठ कर सकते हैं. पाठ से पहले भगवान सूर्य का ध्यान करते हुए 11 बार ऊँ आदित्याय नमः का जाप करें. इसके बाद नीचे दिए गये आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें.

आदित्य हृदय स्तोत्र

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥
पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥
आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥
अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

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